तुम्हारी नज़रों से टकराती हमारी नज़र, कुछ समझ में आयी क्या?

तुम हमें घूरते हो, अंदर ही अंदर सुलगते हो, पीटने की कोशिश करते हो, दबाने की कोशिश करते हो। हम बिखरे से, कमज़ोर से लगते होंगे तुम्हें, हगी थोड़ी कम खायी होगी, विचार के सहारे जीते हैं, अपने सपनों पे भरोसा ज़्यादा करते हैं। आज तमलोग थोड़े व्याकुल हुए होगे ना? तुम्हें वो भी दिखी होगी, जिसने तुम्हें वोट देने का वादा किया होगा, और तुम्हारे पैसे से शायद फ़िल्म भी देख आए हों, और वो भी दिखा होगा जो वोट डालने के बाद तुमसे मिला होगा और कहा होगा आप ही पे वोट गिरा है। कैसा लगा? उन्हें आज़ादी के नारे लगाते देख कर। क़िलस गए होगे ना? मन किया होगा, आज भीड़ का हिस्सा हो, कल अकेले होगे, फिर निपटा जाएगा। तुम यही हो, भीड़ देखते हो, भीड़ के विचार को जानने की कोशिश नहीं करते हो, अगर करते तो, तिरंगा थामे छज्जे पे खड़े ना होते, भीड़ का हिस्सा होते, व्याकुल नहीं आक्रोश से दहाड़ रहे होते। लेकिन, अफ़सोस कि तुम वो नहीं हो, तुमने हमेशा हमें कमज़ोर समझा है, इंटेलेक्चुअल कहके उपहास करते हो, देखो ना पूरी जमात आ गयी आज विवेकशील लोगों की। तुम घबरा गए होगे ना? नहीं घबराए? अब तो सच बोल दो।

सच कहने का अपना मज़ा है। तुम वो मज़ा कभी नहीं महसूस कर सकते क्योंकि तुम डराना चाहते हो, सत्य कभी डराता नहीं है, वह तो आपको मुक्त करता है। तुम झूठ हो, अपने आप में, अपने विचारधारा की तरह, तुम्हारे उस नारे की तरह, तुम्हारे हाथ के झंडे के प्रति तुम्हारे सम्मान की तरह। और हम सत्य हैं, हमारे नारों की तरह, हमारे विचार की तरह, एक दूसरे के आँखों में पल रहे सपनों की तरह। जानना नहीं चाहोगे हमारे अंदर इतनी हिम्मत कहाँ से आती है? तुम जानते भी हो शायद। तुम्हारी वजह से। अगर तुम इतने अतातायी ना होते तो हमारे संघर्ष को पनपने की जगह नहीं मिलती। तुम हमें राष्ट्रद्रोही कहते हो, देशद्रोही कहते हो, कहो। कहते रहो। तुम्हारे कहने या ना कहने से हम कुछ हो नहीं जाते है। हम तो बड़ी सोच रखते हैं। राष्ट्र, देश और समाज इनको भी परिभाषित करते हैं। कई प्रश्न करते हैं एक दिन में। तुम्हारे साकेत कहते हैं, जो भी कश्मीर की आज़ादी की बात करेगा उसे देशद्रोही वो कहते रहेंगे। तुम्हारे पास बस देश ही तो हैं, लेकर उगते हो और लेकर डूबते हो। ख़ैर, आज की बात करते हैं। रामजस पे तुम्हें भरोसा था वो उठ नहीं पाएगा। लेकिन देखो क्या उठा। या फिर कहें क्या उठी! तुम्हारे अंदर के पुरुष को क्या ललकार दी है। अपने कान छुपा के कहाँ भाग रहे हो, इन लड़कियों को देखो, कई लड़कियों में तुमको कॉर्ड उठाए खड़ी गुरमेहर दिखेगी, जिसे तुम कहीं घेरने की कोशिश में लगे हो। उनका आक्रोश देखो, ये वहीं हैं जिन्हें चाचा-ताऊ लोगों ने बीन्दनी, पुतोहू और कनिया बना के रखना चाहा था, तो कुछ ने तो दुनिया में आने ही नहीं। ये मुक्त हैं, अविरल, हमारे विचार की तरह, जिसे ना तुम्हारे आरोप रोक पाएँगे ना धमकियाँ। क्या नज़र मिला सकते हो इनसे? ये हमारा जवाब है, ये हमारी नेत्रियाँ हैं। एक सुनहरे भविष्य की ओर हमारा स्वप्न। जिन्हें दो दिन पहले तुम्हारी पुलिस ने लताड़ा था, लाठियाँ भांजी थी, तुमने भी तो हाथ साफ़ किया था। आज क्यों चुप खड़े हो? परमपूज्य लोगों से आदेश की अपेक्षा कर रहे हो? वो नहीं आएँगे। उन्हें अभी उत्तर प्रदेश ठिकाने लगाना है। वो नहीं हिलेंगे।

 

Picture Credit: Abhijeet Mishra

 

हो सकता है कि मेरी इन बातों पर तुम विचार करो, और फिर सोच समझकर योजनाबद्ध हो कर हमला करो। वैसे भी तो बाहर गाँव से लोग पीटने बुलाते ही हो। हमाईं दिक़्क़त तुम्हारी भाषा से नहीं है, शालीनता से नहीं, दिक़्क़त है तुम्हारे विचार से, कि तुम्हें लगता है कि तुम्हारे विचार ही एक अजर विचार हैं। ऐसा कैसे हो सकता है। समाजशास्त्र में भी तो कुछ परमपूज्य होंगे ना? ज़रा पूछना उनसे उन्होंने कितना समझा है मार्क्स, ग्रामसी, अलथुसेर को कितना पढ़ा है होब्स, स्पेन्सर और वेबर को। तुम लोग गुरुजी से तो पढ़ना शुरू करते हो, और पता नहीं वो भी करते हो या नहीं। फिर किस हक़ से हम पर हुक्म चलाने का प्रयास करते हो? अपनी नज़र बचा के रखो। हमसे मत मिलाओ अभी। शर्म और आक्रोश एक साथ टकराते अच्छे नहीं लगते। ये दिल्ली विश्वविद्यालय है, हमारा विश्वविद्यालय। यहाँ हम सब पढ़ते हैं, सीखते हैं, बड़े होते हैं, एक दूसरे से-एक दूसरे के प्रति सम्मान रखते हैं, हम प्रश्न भी करेंगे और वाद-विवाद भी करेंगे। हम बस्तर के लिए भी लड़ेंगे और कश्मीर के लिए भी। हम तब तक बात करते रहेंगे जब तक हमें जवाब नहीं मिल जाता, हम तब तक नारे लगते रहेंगे जब तक बातें सुनिश्चत नहीं हो जाती।

हर साल फरवरी के महीने में तुम जैसे लोग हमें सबक सिखाना चाहोगे, पीटना चाहोगे, दबाना चाहोगे, हो सकता है मार देना चाहोगे। याद रखना हमें हमारी साँसों से ज्यादा विचार प्यारी है, इंकलाब प्यारा है। हम मारने वाले नहीं संघर्ष करने वाले लोग है, तुम हमें कुछ नहीं सीखा सकते, कुछ नहीं, ना देशभक्ति, ना राष्ट्रप्रेम, ना अपनी संस्था को बचाना और ना ही विरोध करना। तुम ख़त्म हो चुके लोग हो, जो वक़्त बेवक़्त कांपने की कोशिश करते हो। तुमपे क्रोध नहीं, शर्म है, धिक्कार है। 2014 में देश से गलती हुई है, तुम्हारी सौ वो दुहरायेंगे नहीं। ये हमारा विश्वविद्यालय है यहाँ हम वो करेंगे जो हमारा मन करेगा, हम आज़ाद है, मुक्त हैं हम सरफ़रोशी हैं। हम ज़िंदा हैं।

 

(Photos: Abhijeet Mishra)

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