तुम्हारी नज़रों से टकराती हमारी नज़र, कुछ समझ में आयी क्या?

हम तब तक बात करते रहेंगे जब तक हमें जवाब नहीं मिल जाता, हम तब तक नारे लगते रहेंगे जब तक बातें सुनिश्चत नहीं हो जाती। लिखते हैं अंकित झा।



दलित जीवन की झाँकी है तुलसीराम की ‘मुर्दहिया’

दलित ग्रंथ होने के साथ-साथ यह बाल मन को समझने के लिए भी आवश्यक है। जो लोग ‘चिल्ड्रन इन डिफ़िकल्ट सर्कम्स्टैन्सेज़’ पर काम करते हैं, उनके लिए यह पढ़ना आवश्यक है…लिखते हैं अंकित झा।



फ़िल्म विश्लेषण: सिनेमाई सनक, सिनेमाई सिसक व सिनेमाई साहस: उड़ता पंजाब।

यह एक अद्भुत फ़िल्म है, सिनेमाई सनक से लिखी गयी कहानी, सिनेमाई संजीदगी से उकेरे गए चरित्र तथा सिनेमाई साहस से की गयी रचना। उड़ता पंजाब एक साहसी प्रयास है। यह एक फ़िल्म नहीं, एक प्रयास है – लिखते हैं अंकित झा।



क्या अपनी संस्कृति को ख़त्म होते देख रहे हैं सहरिया आदिवासी?

एक सहरिया था जो प्रकृति का हाँथ थामे जीवन यापन किया करता था, एक शहरी है जो शहर से पुरानी मोटरसाइकिल खरीद उसे जंगल में दौड़ाता है. अपने जड़ से उखड़ रहे सहरिया अपने नए अस्तित्व को ढूँढने में लगे हुए हैं, स्वयं को शहरी व्यवस्था में ढालने के प्रयास में लगे हुए हैं। लिखते हैं अंकित झा।



चम्बल के बीहड़ में अपनी ज़मीन के लिए लड़ रहे सहरिया आदिवासी।

ज़मीन उनकी,जंगल उनका, संघर्ष उनकी और न्याय की प्रतीक्षा भी उनकी। कहानी सहरिया आदिवासी के संघर्ष की अपनी ज़मीन वापस पाने के लिए।  एक चम्बल। घाटियों बीहड़ों, बबूल के सूखे मैदान, तथा डकैतों के गश्त के परे एक सतत सघर्ष की रणभूमि। ये संघर्ष जितना प्रत्यक्ष व प्रमाणित है उतना ह अलौकिक भी। यूँ तो […]



जब दण्डकरण्य में पनपता है प्रेम

एक शोध कार्य के सिलसिले में मैं छत्तीसगढ़ के जिले उत्तर बस्तर कांकेर में हफ्ते भर के लिए गया था, उस समस्या को करीब से देखने जो उन जंगलों से लेकर दिल्ली की जगमगाती दीवारों तक बहस छेड़े हुए है. नहीं, मैं कोई इतिहास भूगोल की बात नहीं करूँगा. करूँगा भी तो अगले अंक में. आज जब शुरुआत है तो कुछ रसिक शुरुआत करते हैं. लिखते हैं अंकित झा।



पूंजीवादी पक्षाघात से पीड़ित

देश में आधारभूत संरचना की स्थिति भी इतनी मजबूत नहीं है उस पर से इस तरह संसाधनों का दोहन, किस लिए सिर्फ स्टैण्डर्ड पे खरा उतरने के लिए. Writes Ankit Jha



क्या व्यापमं मामा की राजनीति पे भारी पड़ेगा?

ये घोटाला कतई 2G व सीडब्लूजी जैसा नहीं है, इसमें करोड़ों की गड़बड़ी नहीं है परन्तु ये उन सभी से वीभत्स तथा खतरनाक है. इस गड़बड़ी में देश के भविष्य के साथ छेड़खानी की गयी, देश के प्रतिभा के साथ धोखा किया गया, बुद्धि, विवेक व शिक्षा प्रणाली के आँखों में धुल झोंका गया.



अस्मिता, अहंकार के मध्य अस्तित्व का युद्ध

वृक्ष पर लटकी वो लड़की कौन है, जरा उसे पहचानिए, अच्छे से देख लीजिये, देखिये न, उसका चेहरा आपकी सुपुत्री से कितना मिलता है, आश्चर्य है न ये, कितनी छोटी है ये दुनिया. Writes Ankit Jha.