विमुद्रीकरण की आड़ में गांववालों का शोषण करते बैंक 

किसी की अपनी दर्द भारी दास्ताँ है तो किसी को अपनों को खोने का कभी ना मिटने वाला दर्द। विमुद्रीकरण के बुरे प्रभाव की ख़बरें देश के हर छोटे बड़े इलाकों में देखने और सुनने को मिली है।



क्या अपनी संस्कृति को ख़त्म होते देख रहे हैं सहरिया आदिवासी?

एक सहरिया था जो प्रकृति का हाँथ थामे जीवन यापन किया करता था, एक शहरी है जो शहर से पुरानी मोटरसाइकिल खरीद उसे जंगल में दौड़ाता है. अपने जड़ से उखड़ रहे सहरिया अपने नए अस्तित्व को ढूँढने में लगे हुए हैं, स्वयं को शहरी व्यवस्था में ढालने के प्रयास में लगे हुए हैं। लिखते हैं अंकित झा।



चम्बल के बीहड़ में अपनी ज़मीन के लिए लड़ रहे सहरिया आदिवासी।

ज़मीन उनकी,जंगल उनका, संघर्ष उनकी और न्याय की प्रतीक्षा भी उनकी। कहानी सहरिया आदिवासी के संघर्ष की अपनी ज़मीन वापस पाने के लिए।  एक चम्बल। घाटियों बीहड़ों, बबूल के सूखे मैदान, तथा डकैतों के गश्त के परे एक सतत सघर्ष की रणभूमि। ये संघर्ष जितना प्रत्यक्ष व प्रमाणित है उतना ह अलौकिक भी। यूँ तो […]



जब दण्डकरण्य में पनपता है प्रेम

एक शोध कार्य के सिलसिले में मैं छत्तीसगढ़ के जिले उत्तर बस्तर कांकेर में हफ्ते भर के लिए गया था, उस समस्या को करीब से देखने जो उन जंगलों से लेकर दिल्ली की जगमगाती दीवारों तक बहस छेड़े हुए है. नहीं, मैं कोई इतिहास भूगोल की बात नहीं करूँगा. करूँगा भी तो अगले अंक में. आज जब शुरुआत है तो कुछ रसिक शुरुआत करते हैं. लिखते हैं अंकित झा।